Samrat Ashok – कौन थे? जीवन, संघर्ष और बौद्ध धर्म में योगदान

सम्राट अशोक एक महान भारतीय शासक थे जिन्होंने मौर्य वंश का विस्तार किया था। वे भारतीय इतिहास में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अशोक का जन्म 304 ईसा पूर्व मगध साम्राज्य के राजा बिंदुसार के पुत्र के रूप में हुआ था।

उनका जन्मस्थान पटना, बिहार, भारत है जिसे उस समय पाटलिपुत्र कहा जाता था। ना samrat ashok के जैसा कोई हुआ न ही होगा, अपने समय के सर्वश्रेष्ठ राजाओं मे से एक जिससे लोग थर-थर कापते थे | जो एक सनातनी धर्म मे पैदा हुए | कलिंग युध्द मे किये नरसंहार के कारण व्याकुल होकर उन्होंने अहिंसा अपनाने के लिए बौद्ध पन्थ को अपना लिया|

परिचय

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सम्राट अशोक मौर्य वंश के महान शासक थे, जिनका जन्म लगभग 304 ईसा पूर्व पाटलिपुत्र (वर्तमान पटना) में हुआ था। वे चंद्रगुप्त मौर्य के पोते और बिंदुसार के पुत्र थे। अशोक ने 269 ईसा पूर्व में मौर्य साम्राज्य की सत्ता संभाली और कलिंग युद्ध (261 ई.पू.) के बाद उनका जीवन पूरी तरह बदल गया। युद्ध में हुई लाखों लोगो की मृत्यु को देखकर बौद्ध धर्म अपनाया और अहिंसा, करुणा तथा धर्म के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया। उन्होंने पूरे भारत और पड़ोसी देशों में बौद्ध धर्म का प्रचार किया।

अशोक स्तंभ, सांची स्तूप और अनेक धर्मशिलाएँ उनके द्वारा करवाए गए महान कार्यों में शामिल हैं। सम्राट अशोक ने जनकल्याण के लिए सड़कें, अस्पताल, जलाशय और धर्मशालाएँ बनवाईं। अशोक को ‘देवानांप्रिय’ और ‘प्रियदर्शी’ की उपाधियाँ दी गईं। उनका शासन आदर्श, न्यायप्रिय और धार्मिक सहिष्णुता का प्रतीक माना जाता है।

प्रारंभिक जीवन

सम्राट अशोक का जन्म लगभग 304 ईसा पूर्व में पाटलिपुत्र (वर्तमान पटना, बिहार) में हुआ था। वे मौर्य वंश के संस्थापक चंद्रगुप्त मौर्य के पौत्र और सम्राट बिंदुसार के पुत्र थे। उनकी माता  अधिकांश इतिहासकारों के अनुसार उनकी माता का नाम सुभद्रांगी या धर्मा था।

अशोक के बचपन के बारे में ज्यादा जानकारी उपलब्ध नहीं है, लेकिन यह माना जाता है कि उन्होंने राजकुमार के रूप में कठोर प्रशिक्षण प्राप्त किया, जिसमें युद्ध कला, शासन प्रणाली, और विभिन्न विद्याओं का अध्ययन शामिल था।

अशोक के कई भाई-बहन थे, और मौर्य साम्राज्य में उत्तराधिकार के लिए प्रतिस्पर्धा आम थी। युवावस्था में अशोक को उनके पिता बिंदुसार ने विभिन्न प्रशासनिक और सैन्य जिम्मेदारियाँ सौंपीं।

वे तक्षशिला (वर्तमान पाकिस्तान में) के गवर्नर के रूप में नियुक्त किए गए, जहाँ उन्होंने विद्रोहों को दबाने में अपनी कुशलता दिखाई। उनकी बहादुरी और रणनीतिक कौशल ने उन्हें एक शक्तिशाली योद्धा और प्रशासक के रूप में स्थापित किया।

कलिंग युध्द

अशोक ने अपने साम्राज्य को और मजबूत करने के लिए कई युद्ध लड़े, जिसमे से एक युध्द था—कलिंग युद्ध (261 ईसा पूर्व)। यह युद्ध आज के ओडिशा में हुआ। जो उस समय का सबसे बड़ा और चर्चित युध्द था जिसमे लाखो लोगो का मृत्यु हुई | अशोक की सेना ने कलिंग को जीत लिया, लेकिन इस जीत की कीमत बहुत भारी थी। लाखों लोग मारे गए, गाँव उजड़ गए, और चारों तरफ तबाही मच गई। युद्ध के बाद जब अशोक खून से सने मैदान में घूमे, तो उन्होंने मरे हुए सैनिकों, रोते-बिलखते परिवारों और जलते गाँवों को देखा। इस दृश्य ने उनके दिल को हिला दिया।

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एक बौद्ध भिक्षु से मुलाकात ने अशोक के जीवन को हमेशा के लिए बदल दिया। भिक्षु ने उन्हें बताया कि सच्ची जीत तलवार से नहीं, बल्कि प्रेम और करुणा से मिलती है। इस घटना ने अशोक को बौद्ध धर्म की ओर मोड़ा। उन्होंने युद्ध छोड़कर शांति और अहिंसा का रास्ता चुना। यहीं से हृदय परिवर्तन होने के कारण सम्राट अशोक “चंडाशोक” से “धर्माशोक” बन गए।

चंडाशोक का युग

चंडाशोक के नाम से मशहूर सम्राट अशोक अपने शुरुआती शासनकाल में क्रूर और युद्धप्रिय राजा के रूप में जाने जाते थे। 268 ईसा पूर्व में मौर्य सिंहासन हासिल करने के बाद, उन्होंने अपने साम्राज्य का विस्तार करने के लिए कई युद्ध लड़े।

उनकी क्रूरता की कहानियाँ प्रचलित थीं, खासकर जब उन्होंने अपने भाइयों को सत्ता के लिए परास्त किया। सबसे बड़ा उदाहरण कलिंग युद्ध (261 ईसा पूर्व) है, जिसमें लाखों लोग मारे गए और भारी तबाही हुई। इस युद्ध ने अशोक को “चंडाशोक” की उपाधि दी, क्योंकि उनकी तलवार ने कलिंग को रक्तरंजित कर दिया। तो अब जानते है धर्माशोक की कहानी!

धर्माशोक का युग

बौद्ध धर्म अपनाने के बाद अशोक ने अपने साम्राज्य को एक नया रूप दिया। उन्होंने युद्ध की जगह शांति को बढ़ावा दिया। अशोक ने सभी धर्मों का सम्मान किया और धार्मिक सहिष्णुता को प्रोत्साहन दिया। उनके शिलालेखों में लिखा है कि सभी धर्मों का मकसद एक ही है—मानवता की भलाई।

अशोक ने अपनी प्रजा के लिए कई कल्याणकारी काम किए। उन्होंने सड़कें बनवाईं, पेड़ लगवाए, और यात्रियों के लिए विश्राम गृह और कुएँ बनाए।

अस्पताल खोले गए, जहाँ इंसानों के साथ-साथ पशुओं का भी इलाज होता था। शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर किया गया। अशोक ने दास प्रथा को कम करने की कोशिश की और महिलाओं के अधिकारों को बढ़ावा दिया।

अशोक के शिलालेख

अशोक ने पूरे भारत में पत्थरों और स्तंभों पर शिलालेख खुदवाए। इनमें उनकी नीतियाँ, विचार और बौद्ध धर्म के संदेश लिखे गए। ये शिलालेख जनता को सत्य, अहिंसा और नैतिकता का पाठ पढ़ाते थे। उनके प्रसिद्ध अशोक स्तंभ, जैसे सारनाथ का सिंह स्तंभ, आज भारत की सांस्कृतिक धरोहर हैं। अशोक चक्र, जो उनके स्तंभ से लिया गया, भारत के शान राष्ट्रीय ध्वज का हिस्सा इसी स्तंभ से लिया गया है।

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अशोक ने बौद्ध धर्म को न केवल भारत में, बल्कि श्रीलंका, थाईलैंड, म्यांमार और मध्य एशिया तक फैलाया। उनके बेटे महेंद्र और बेटी संघमित्रा ने श्रीलंका में बौद्ध धर्म की नींव रखी। अशोक की वजह से बौद्ध धर्म एक विश्व धर्म बना।

अंतिम दिन और विरासत

सम्राट अशोक के अंतिम वर्ष शांति, अहिंसा,भक्ति भाव,  और बौद्ध धर्म के प्रचार में बीते। 232 ईसा पूर्व में, 72 वर्ष की आयु में पाटलिपुत्र में उनका निधन हुआ। अपने अंतिम दिनों में अशोक ने सादा जीवन अपनाया, अपना धन दान किया और ध्यान व धर्म चर्चा में समय बिताया। उन्होंने अपने बच्चों, महेंद्र और संघमित्रा, को बौद्ध धर्म फैलाने के लिए प्रेरित किया, जिन्होंने श्रीलंका में इसे स्थापित किया।

अशोक की मृत्यु के बाद मौर्य साम्राज्य कमजोर हुआ, लेकिन उनकी विरासत अमर रही। उनके शिलालेख और स्तंभ, जैसे सारनाथ का सिंह स्तंभ, भारत की धरोहर हैं। अशोक चक्र भारत के राष्ट्रीय ध्वज का हिस्सा है। उन्होंने बौद्ध धर्म को श्रीलंका, थाईलैंड और मध्य एशिया तक फैलाया, जो आज भी जीवित है। उनकी अहिंसा, करुणा और धार्मिक सहिष्णुता की नीतियाँ विश्व प्रसिद्ध हैं। अशोक की कहानी हमें सिखाती है कि क्रूरता से शांति की ओर बदला जा सकता है। वे एक योद्धा से मानवतावादी बने, जिनकी शिक्षाएँ आज भी प्रेरणा देती हैं।

निष्कर्ष

सम्राट अशोक की जीवनी एक ऐसी कहानी है, जो हमें सिखाती है कि सच्चा परिवर्तन संभव है। “चंडाशोक” से “धर्माशोक” बनने का उनका सफर दिखाता है कि क्रूरता को छोड़कर करुणा और शांति का रास्ता अपनाया जा सकता है। कलिंग युद्ध की भयावहता ने उन्हें अहिंसा की राह दिखाई, और उन्होंने अपने साम्राज्य को कल्याणकारी राज्य में बदला।

उनके शिलालेख आज भी सत्य, नैतिकता और मानवता का संदेश देते हैं। अशोक चक्र भारत के झंडे में उनकी शांति की विचारधारा को दर्शाता है। उनकी शिक्षाएँ हमें प्रेरित करती हैं कि हम अपने जीवन में प्रेम, सहानुभूति और धार्मिक सहिष्णुता को अपनाएँ। अशोक का जीवन यह सिखाता है कि एक व्यक्ति अपने कार्यों से दुनिया बदल सकता है।

अगर हम उनके जैसे साहस और करुणा के साथ आगे बढ़ें, तो हम भी अपने आसपास शांति और बेहतरी ला सकते हैं। साथ-साथ आप भी दृढ संकल्प ले (जैसे सम्राट अशोक ने अहिंसा का लिया) तो आप भी हर संभव कार्य कर सकते हो, बस हमे चाहिए तो नियमितता और धैर्य |

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